महात्मा गांधी के प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग | mahatma gandhi prerak prasang

प्रेरक प्रसंग: 1. कम-अधिक

महात्मा गांधी इंग्लैंड की महारानी से मिलने अपनी चिर-परिचित छोटी-सी धोती और सादी चादर में गए थे।

इस पर पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया और पूछा, “गांधी जी,आप महारानी से मिलने गए और वह भी इतने कम कपड़े पहनकर! आपको बुरा नहीं लगा क्या?”

गांधीजी ने कहा, “इसमें बुरा लगने की क्या बात है ? स्वयं महारानी ने ही इतने कपड़े पहन रखे थे कि वे दोनों के लिए काफी थे।”

प्रेरक प्रसंग: 2. पछतावा

गांधीजी ने बिहार के चंपारन में किसानों को एकत्र कर आंदोलन छेड दिया एक एग्लो इडियन ने गाधीजी की हत्या करने की योजना बनाई किसी व्यक्ति ने उन्हें खबर दे दी।

वह रात को बारह बजे उस एंग्लो-इंडियन के घर पहुंच गए। उसने पूछा, “आप कौन हैं ?”

गांधीजी ने कहा, “आपने जिसकी हत्या करने का निश्चय किया है, मैं वहीं गाधी हूँ। अकेला आया हूँ। मेरे पास कोई हथियार नहीं है। आप अपनी इच्छा पूरी कर लीजिए।”

एंग्लो-इंडियन शर्म से पानी-पानी हो गया । उसने गांधीजी के चरण पकड़ लिए और क्षमा माँगने लगा।

प्रेरक प्रसंग: 3. शांत चित्त

शाम का समय था। गांधीजी प्रार्थना कर रहे थे। तभी एक साँप वहाँ आ गया और उनकी ओर बढ़ने लगा। उनके साथी एकदम घबरा गए।

इस हलचल के कारण साँप डर गया और गांधीजी की गोद में चढ़ गया। उन्होंने सबको शांत रहने का इशारा कर प्रार्थना जारी रखी। साँप गोद से उतरा और चुपचाप चला गया।

गांधीजी से लोगों ने पूछा, “साँप के चढ़ने पर आपको कैसा लगा?”

गाधीजी ने उत्तर दिया, “पहले तो मैं घबरा गया, पर बाद में शांत चित्त हो गया। अगर साँप मुझे काट भी लेता, तो मैं कहता कि इसे मत मारो, इसे जाने दो।

प्रेरक प्रसंग: 4. उपहार

गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका के दमनकारी तानाशाह जनरल स्मट्स ने बार-बार जेल भेजा। गांधीजी ने जेल में एक मोची से जूते बनाना सीखा।

जब गांधीजी को रिहाकिया गया, तो उन्होंने एक पैकेट स्मट्स को भेंट किया। “क्या इसमें कोई बम है ?” कहते हुए स्मट्स ने पैकेट खोला।

गांधीजी ने कहा, “यह मेरी तरफ से आपको विदाई का उपहार है।” उसमे गांधीजी के बनाए हुए सैंडिल थे।

वर्षों बाद गांधीजी के जन्मदिन पर जनरल स्मट्स ने उन्हें पत्र लिखा-मैने उन सैंडिलों को गर्मियों के दौरान पहना, हालाँकि मैं महसूस करता हूँ कि मैं उन्हें पहनने का पात्र नहीं हूं।

प्रेरक प्रसंग: 5. माइनस फोर

महात्मा गांधीजी गोलमेज सम्मेलन से अपने देश वापस आ रहे थे। फ्रांस के एक बदरगाह पर कुछ पत्रकार उनसे मिलने आए। पत्रकार उस समय की फैशनेबल पोशाक ‘प्लस फोर’ सूट पहने थे, लेकिन गांधीजी धोती पहने हुए थे।

पत्रकार उन्हे उस पोशाक में देखकर हैरान रह गए, क्योंकि उन्होंने तो यह कल्पना भी नहीं कीथी कि गांधीजी धोती पहने होंगे। गांधीजी उनकी परेशानी समझ गए और हँसते हुए बोले, “आप लोग फ्रांस की पोशाक ‘प्लस फोर’ पहने हैं और मैं भारत की पोशाक ‘माइनस फोर’ पहने हूँ।”

प्रेरक प्रसंग: 6. पहला गिरमिटिया

महात्मा गांधी ने जब दक्षिण अफ्रीका में अपनी वकालत आरंभ की, तो थोड़े दिन बाद ही एक गिरमिटिया मजदूर, जिसका नाम बालसुंदरम् था, बड़ी बुरी हालत में गाधीजी के पास आया। उसके कपड़े फटे हुए थे और सामने के दो दाँत टूटे हुए थे। उसके शरीर पर चोटों के निशान थे।

यह देखकर गांधीजी को बहुत दुख हुआ। उन्होंने एक गोरे डॉक्टर से उसका इलाज करवाया और उसी डॉक्टर से चोट का प्रमाण-पत्र लेकर मजदूर के मालिक के खिलाफ मुकदमा चलाया।

मजदूर को उन्होंने जितवा दिया और इसके साथ ही उसके लिए एक नेक मालिक भी ढूँढ़ कर दिया। इसके बाद गांधीजी गरीब भारतीय मजदूरों में लोकप्रिय हो गए और उन्हे असहायों के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

प्रेरक प्रसंग: 7. दूसरों का सुख

महात्मा गांधी साथियों के साथ रेल से यात्रा कर रहे थे। जिस डिब्बे में गांधीजी बैठे थे, उसकी छत थोड़ी टूटी हुई थी। बरसात का मौसम था। जब बारिश शुरू हुई, तो छत टपकने लगी। पानी गिरता देखकर उनके साथियों ने बापू जी का सामान और कागज सँभालकर एक ओर रख दिए।

अगले स्टेशन पर एक साथी गार्ड के पास पहुँचा और डिब्बे की हालत बयान की। गार्ड तुरंत डिब्बे में आया और बोला, “बापू जी, आपके लिए दूसरा डिब्बा खाली करवाने का आदेश दे दिया है। आप उसमें बैठ जाइएगा।” “और उस डिब्बे के यात्री कहाँ बैठेंगे ?” गांधीजी ने प्रश्न किया।” हमारे पास और कोई डिब्बा नहीं है। इसलिए उस डिब्बे के यात्री इस डिब्बे में बैठ जाएँगे।” गार्ड ने कहा।

गार्ड की बात सुनकर बापू बहुत दुखी हुए और उन्होंने कहा, “मैं सुख से बेठू और मेरे लिए सुख से बैठे हुए लोग परेशान हों, यह मेरे लिए लज्जा की बात है। पहले वे सुख से बैठेंगे, तब मैं बैठूंगा। मैं उनके डिब्बे में जाऊँ, ऐसा कभी नहीं हो सकता” बापू ने कहा। गार्ड ने उनके दृढ निश्चय को समझ लिया और क्षमा माँगी।

प्रेरक प्रसंग: 8. अनेक अर्जुन

महात्मा गांधी सन् 1930 में जेल में थे। साबरमती आश्रम के बच्चे हर हफ्ते उन्हें पत्र लिखा करते थे। पत्रों में वे अजीब-अजीब प्रश्न पूछते। गांधीजी उनका जवाब संक्षेप में देते। एक बार एक बच्चे ने शिकायत लिखी-बापू, आप गीता की चर्चा बहुत करते हैं, लेकिन गीता में अर्जुन बहुत संक्षेप में प्रश्न पूछते थे और श्रीकृष्ण अनेक वाक्यों में उसका जवाब देते थे, किंतु आप हमारे लंबे-लंबे प्रश्नों का जवाब एक ही वाक्य में दे देते है ऐसा क्यों?

गांधीजी ने उत्तर में लिखा-कारण स्पष्ट है। श्रीकृष्ण के पास एक अर्जुन था, जबकि मेरे पास अर्जुनों का पूरा झुंड है। उत्तर लिखते हुए गांधीजी मुस्करा रहे थे।

प्रेरक प्रसंग: 9. करुणा

गाधीजी करुणा के सागर थे। इंसानों के लिए उनके मन में अपार करुणा भरी थी। एक बार गांधीजी दक्षिण अफ्रीका की जेल में थे। उनका स्वास्थ्य ठीक नही था। इसलिए उनके काम के लिए एक नीग्रो को रखा गया, जो हिंदी नहीं जानता था। जेल अधिकारी उस नीयो के माध्यम से उन्हें परेशान करना चाहते थे। एक दिन नीग्रो दर्द से कराहता हुआ गांधीजी के पास पहुँचा। वह हिंदी तो जानता नहीं था, इसलिए उसने इशारे से गांधीजी को बताया कि उसके हाथ में बिच्छू ने काट लिया है।

गांधीजी सारी बात समझकर बोले, “तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें अभी ठीक किए देता हूँ।” और उन्होंने घाव पर मुँह रखकर डंक का विष चूसना शुरू कर दिया। गांधीजी के चूसने के साथ-साथ जहर और पीड़ा कम होती गई। कैदी को आराम मिला। इस घटना के बाद वह नीग्रो गांधीजी का भक्त हो गया ।

प्रेरक प्रसंग: 10. समर्पण

गांधीजी के मन में माता-पिता और देश के लिए अपना सब कुछ समर्पित करने की भावना कूट-कूटकर भरी थी।

जब वह छोटे थे, तब एक अध्यापक ने सभी से एक प्रश्न पूछा, “तुम अपने माता-पिता के साथ कहीं जा रहे हो और रास्ते में तुम्हें शेर मिल जाए, तो तुम क्या करोगे?”

सभी ने अपने-अपने ढंग से उत्तर दिए, लेकिन एक बच्चे का उत्तर सुनकर हैरानी से उनकी आँखें फैल गई। उस बच्चे ने कहा, “मैं शेर से कहूँगा कि वह मुझे खा जाए, पर मेरे माता-पिता को छोड़ दे।” यही बालक आगे चलकर महात्मा गांधी के रूप में सर्वप्रिय बन गया।

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