ईश्वर चंद्र विद्यासागर के प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग

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ईश्वर चंद्र विद्यासागर उन्नीसवीं शताब्दी के एक भारतीय शिक्षक और समाज सुधारक थे। संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध पाण्डित्य के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज ने उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की थी।

वे नारी शिक्षा के समर्थक थे। उनके प्रयास से ही कलकत्ता में एवं अन्य स्थानों में बहुत अधिक बालिका विद्यालयों की स्थापना हुई थी।

उस समय हिन्दु समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत ही शोचनीय थी। उन्होनें विधवा पुनर्विवाह के लिए लोकमत तैयार किया। उन्हीं के प्रयासों से 1856 ई. में विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ। उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से ही किया। उन्होंने बाल विवाह का भी विरोध किया।

आइये आज हम इस लेख में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के कुछ प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग के बारे में जानते है।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर के प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग

प्रेरक प्रसंग 1. एक रुपया

विख्यात समाज-सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर कहीं जा रहे थे। एक बालक आया और बोला, “एक पैसा दे दो”।

विद्यासागर बोले, “अगर मैं तुम्हें एक पैसे की जगह एक रुपया दूँ, तो क्या करोगे ?”

बालक ने कहा, “फिर मैं भीख नहीं माँगूंगा।” विद्यासागर ने उसे एक रुपया दे दिया।

कई वर्ष बाद विद्यासागर बाजार में घूम रहे थे, तो एक युवक ने उन्हें प्रणाम किया और कहा, “मैं वही हूँ, जिसे आपने एक रुपया दिया था। उससे मैंने फलों का धंधा शुरू किया और आज मेरी इसी बाजार में दुकान है। आप उसे अपनी चरण-धूलि से पवित्र करें।”

प्रेरक प्रसंग 2. शिष्टाचार

ईश्वरचंद्र विद्यासागर सादा जीवन और उच्च विचारों वाले थे। उन्हें कहीं भी, किसी से भी मिलने जाना होता था, तो वह धोती, चादर और चप्पल ही पहनते थे।

एक बार वह प्रेसीडेंसी कॉलेज के अंग्रेज प्रिंसिपल कैट से मिलने गए। उन्होंने देखा, कैट ने अपने पैर जूतों सहित मेज पर रखे हुए हैं और उन्होंने न तो विद्यासागर जी को बैठने के लिए कहा और न ही अपने पैर नीचे किए।

विद्यासागर जी को बुरा तो लगा, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा और बातचीत करके चले आए। कुछ दिनों बाद मिस्टर कैट को संस्कृत कॉलेज आना हुआ।

जब उन्होंने कार्यालय में प्रवेश किया तो विद्यासागर जी ने अपने पैर जूतों समेत मेज पर रख लिए और उन्हें बैठने के लिए भी नहीं कहा। उनके इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर कैट ने उनकी शिकायत शिक्षा परिषद् के सचिव डा. मुआट से कर दी।

सचिव ने उनसे पूछा, तो उन्होंने कहा, “मैं ठहरा एक हिंदुस्तानी। यूरोप के तौर-तरीके भला में क्या जानूँ? कुछ दिन हुए मैं मिस्टर कैट से मिलने गया था, तो मैंने उनको हू-ब-हू ऐसे ही बैठे देखा था और यह मुझसे बैठने को कहे बिना ही बातचीत करते रहे।

पहले तो मुझे हैरत हुई, लेकिन फिर सोचा, शायद यूरोप में शिष्टाचार का यही ढंग हो। लिहाजा जब यह मेरे ऑफिस में आए, तो मैं उसी शिष्टता से पेश आया।” मुआट सारी बात समझ गए और उन्होंने मामले को रफा-दफा कर दिया।”

प्रेरक प्रसंग 3. विनम्रता

बंगाल के सुप्रसिद्ध विद्वान् ईश्वरचंद्र विद्यासागर गर्मी की छुट्टियाँ बिताने अपने गाँव गए थे। वह रेल की तीसरी श्रेणी में सफर कर रहे थे। स्टेशन पर जब वह उतरे, तो उन्होंने देखा कि एक विद्यार्थी, जो उनके ही डिब्बे से उतरा था, सामान उठाने के लिए कुली-कुली चिल्ला रहा था। विद्यासागर जी ने सोचा, इसे यहाँ कुली कहाँ मिलेगा।

फिर कुछ सोचकर वह उसके पास गए और उसका सूटकेस उठाकर कहा, “चलिए।” और छात्र को उसके घर पहुंचा दिया। जब विद्यार्थी ने पैसे देने चाहे तो उन्होंने मना कर दिया।

शाम के समय पं. ईश्वरचंद्र विद्यासागर के सम्मान में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन हुआ। हजारों लोग आए थे। उनमें वह विद्यार्थी भी आया। सभा के बाद वह ईश्वरचंद्र जी के पास पहुंचा और अपना सिर उनके चरणों में रखकर माफी माँगने लगा।

प्रेरक प्रसंग 4. सात रुपए

ईश्वरचंद्र विद्यासागर को एक आवश्यक पत्र देने एक डाकिया उनके घर पर आया। विद्यासागर जी ऊपर की मंजिल पर थे । डाकिया नीचे बैठकर उनका इंतजार कर रहा था। गर्मी के दिन थे। इसी कारण डाकिए को नींद आ गई।

जब विद्यासागर जी नीचे आए, तो उन्होंने डाकिए को सोते देखा । उन्होंने चुपके से चिट्ठी ले ली और उसे पंखा करने लगे। तभी उनके एक परिचित भी पहुँच गए।

उन्हें पंखा करते देखकर हैरानी से बोले, “आप यह क्या कर रहे है ? इसे पंखा क्यों कर रहे हैं? कहाँ यह सात रुपए वेतन पाने वाला और कहाँ आप।

“विद्यासागर जी बोले, “अरे भाई, मेरे पिताजी ने सात रुपए के वेतन से ही हमारे सारे परिवार को पाला था। वह भी भरी दोपहरी में काम पर जाया करते थे।”

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